Untitled by Kedarnath Singh जैसे जेल में लालटेन चाँद उसी तरह एक पेड़ की नंगी डाल से झूलता हुआ और हम यानी पृथ्वी के सारे के सारे क़ैदी खुश कि चलो कुछ तो है जिसमें हम देख सकते हैं एक-दूसरे का चेहरा! Rate this poem: Report SPAM Reviews Post review No reviews yet. Report violation Log in or register to post comments