Untitled by Jagdish Gupt बचपन में काग़ज़ पर स्याही की बूंद डाल कोने को मोड़ कर छापा बनाया जैसा रूप रेखा के इधर बना, वैसा ही ठीक उधर आया। भोर के धुंधलके में ऎसी ही लगी मुझे छतरीदार नाव के साथ-साथ चलती हुई छाया । Rate this poem: Report SPAM Reviews Post review No reviews yet. Report violation Log in or register to post comments